Monday, September 28, 2020
What Sparks Poetryसोच ख़ास

कविता दरअसल हम अपने व्यक्तित्व से लिखते हैं. अपनी उस अंदरूनी आवाज़ को, उस व्यक्तित्व को लगातार खोजा और सँवारा जाना चाहिए : गीत चतुर्वेदी

टीम सोशल चटनी

27 नवंबर 1977 को मुंबई में जन्मे गीत चतुर्वेदी को हिंदी के सबसे ज़्यादा पढ़े जाने वाले समकालीन लेखकों में से एक माना जाता है। उनकी दस किताबें प्रकाशित हैं, जिनमें दो कहानी-संग्रह (‘सावंत आंटी की लड़कियाँ’ व ‘पिंक स्लिप डैडी’, दोनों 2010) तथा दो कविता-संग्रह (‘आलाप में गिरह’, 2010 व ‘न्यूनतम मैं’, 2017 ) शामिल हैं। ‘न्यूनतम मैं’ क़रीब दो साल तक हिंदी की बेस्टसेलर सूची में शामिल रहा। साहित्य, सिनेमा व संगीत पर लिखे उनके निबंधों का संग्रह ‘टेबल लैम्प’ 2018 में आया। सोशल चटनी और डार्क रूम पोएट्स से बातचीत में गीत ने उनके विचारों और उनके लेखक होने के कामियाब सफर पर रौशनी डाली।

साहित्य पढ़ने और लिखने की शुरुवात

पढ़ने का माहौल तो घर में ही था. बहुत सारी किताबें थीं. कॉमिक्स थीं. उन्हें पढ़ता था. फिर जब मैं नौवीं कक्षा में आया, तब बच्चों की पत्रिका ‘टिंकल’ में मेरी एक कहानी छपी. इससे लिखने में मेरी दिलचस्पी बढ़ी. और फिर पढ़ने में भी बढ़ती गई. किशोरावस्था तक आते-आते मैं घनघोर पाठक बन चुका था. सामने जो चीज़ आती, उसे पढ़ने लगता. कविताएँ मुझे आकर्षित करती थीं. एक कारण तो यह भी था कि उन्हें पढ़ने में कम समय लगता, लेकिन मन में वे लंबे समय तक साथ रहतीं.

परवरिश पर कला का प्रभाव

बहुत हद तक. किताबों में मेरी रुचि का पूरा श्रेय मेरे परिवार को है. मेरे पिता, बड़े भाई, बड़ी बहन- ये लोग बेहद पढ़ाकू थे. इन्हीं लोगों ने किताबों से मेरी दोस्ती कराई. लेखन की ओर मुझे मेरी बड़ी बहन ले आईं. मेरे पिता कहते थे- अगर तुम्हें एक पंक्ति लिखनी है, तो उसके पीछे एक हज़ार पंक्तियों का अध्ययन होना चाहिए. किशोरावस्था में मुझमें सब्र नहीं था. मुझे लगता था, सबकुछ पढ़कर ख़त्म कर दिया जाए, तो मैं बहुत तेज़ पढ़ने की कोशिश करता था. मेरे बड़े भाई ने मुझे मंथर पाठ यानी स्लो रीडिंग का महत्व समझाया. मैं धीरे पढ़ता हूँ. उससे भी धीरे लिखता हूँ. एडम ज़गाएव्स्की की कविता की एक पंक्ति है : मैं इतना धीरे लिखता हूँ जैसे कि मैं दो सौ साल तक जियूँगा. मुझे कई बार लगता है कि ज़गाएव्स्की ने यह पंक्ति मेरे लिए लिखी है.

आरंभिक दिनों में मुझे अच्छे दोस्त मिले. अच्छी किताबें मिलीं. कॉमरेड सूर्यदेव उपाध्याय के रूप में मुझे एक बेहद दूरदर्शी शिक्षक मिले. उनकी एक बड़ी-सी लाइब्रेरी थी. मुझ पर उनका इतना स्नेह था कि उन्होंने मुझे लाइब्रेरी की चाभी दे दी थी. मैं रात-भर वहाँ जागकर पढ़ता रहता था. कई बार मैं दस-दस दिन तक घर नहीं जाता था. लाइब्रेरी में ही पड़ा रहता था. वहीं खाता, नहाता, पढ़ते हुए फ़र्श पर चादर बिछाकर सो जाता था. और जो चीज़ें मेरे सिर के ऊपर से निकल जाती थीं, उनके बारे में अगली शाम उपाध्याय जी से पूछता था. बहुत धैर्य के साथ वह मेरी शंकाएँ दूर करते थे.

मेरा सौभाग्य है कि मेरे आसपास जितने लोग रहे, सबने हमेशा मुझे प्रोत्साहित किया. मेरे दोस्तों ने मुझे किताबें तोहफ़े में दीं, कॉपी-क़लम भेंट की, और सबसे सुंदर बात यह कि उन्होंने मुझे एकांत दिया. आपके परिजन व मित्र बिना आपसे नाराज़ हुए आपको तोहफ़े की तरह एकांत दें, तो इससे सुंदर भला और क्या हो सकता है? इसलिए, मैं बेहद कृतज्ञ रहता हूँ. इसीलिए, मेरे पास सपने हैं, लेकिन फूहड़ महत्वाकांक्षाएँ नहीं हैं. मुझे बहुत ज़्यादा कुछ नहीं चाहिए. मैं चाहता हूँ कि उम्र पूरी होने तक, मैं चार सुंदर पंक्तियाँ लिख लूँ. जब मैं मरूँगा, वही चार पंक्तियाँ मुझे कंधा देंगी.

प्रेरणा स्त्रोत – मेरी भाषा मेरा भविष्यऔर दूध के दांत

दोनों कविताएँ बहुत अलग हैं. ‘दूध के दाँत’ थोड़ी पुरानी है, 2011 की, और मेरी किताब ‘न्यूनतम मैं’ में शामिल है. ‘मेरी भाषा, मेरा भविष्य’ अपेक्षाकृत नई है, 2015 का काम है. हिंदी में अभी तक यह किसी संग्रह में शामिल नहीं, लेकिन हाल ही में मेरी कविताओं की एक किताब अंग्रेज़ी में अनूदित होकर अमेरिका से प्रकाशित हुई है – ‘द मेमरी ऑफ नाउ’, यह उसमें रखी गई है. अनिता गोपालन ने उसे बहुत सुंदरता से अंग्रेज़ी में ढाला है और उन्होंने ‘वर्ल्ड लिटरेचर टुडे’ में इस कविता के आसपास एक सुंदर निबंध भी लिखा था.

‘मेरी भाषा, मेरा भविष्य’ – यह कविता भी एक छवि से निकलकर आती है. मैंने कई बार देखा है, पुलों के नीचे, कचरे के ढेर में, बैठकर खाना खाते, चाय पीते बुज़ुर्गों को. ऐसे मिलते-जुलते दृश्य दूसरों के गद्य व कविता में भी पढ़े हैं. मेरे सामने बार-बार वह छवि आती थी. मुझे लगा, जो बूढ़ा, पुल के नीचे, कचरे के ढेर में बैठा, चाय में डबलरोटी डुबाकर खाता है, वह मेरी भाषा का सबसे बूढ़ा कवि है. वही शायद आदि-कवि है. हमारी आधुनिकताओं से बहुत पहले ही आधुनिक नियति को प्राप्त हुआ आदि-कवि. अब कविता उससे छूट चुकी है या फिर वह एक अनलिखी कविता की कटी हुई पंक्ति की तरह पुल के नीचे गिरा पड़ा है. किसी उपेक्षित पंक्ति की तरह. एक भूतपूर्व कवि की तरह. क्या वह मैं हूँ? क्या वह पुल मेरी भाषा का पुल है? क्या बरसों बाद मैं ऐसा हो जाऊँगा? क्या मेरी भाषा के कवि ऐसे हो जाएँगे?  चारों ओर से मेरी भाषा पर संकट हैं. कविता दिन-ब-दिन हाशिए पर, और हाशिए पर, धकेली जा रही है. कविता के नाम पर जो कुछ चल रहा, वह कविता को और दूर कर रहा है. उस बूढ़े ने कविता लिखनी बंद कर दी है, तो क्या उसकी अनलिखी कविताएँ ही उसके शरीर पर बाल बनकर उग रही हैं? उसने ईश्वर को मानना बंद कर दिया है, तो क्या सारे देवता उसकी दाढ़ी में जूँ बनकर विचरने लगे हैं? यह कौन आदमी है? और यह कौन-सी भाषा है? और यह कैसा भविष्य है, जिसे देखने के लिए कोई दिव्य-दृष्टि नहीं चाहिए. यह इतना स्पष्ट भविष्य है कि विशुद्ध वर्तमान है. क्या यह आदमी बचेगा? क्या यह भाषा बचेगी? पता नहीं, लेकिन इतने दिनों तक बचा हुआ है, तो बस प्रेम के भरोसे. इसे अपने प्रेम का चेहरा, नाम याद नहीं, लेकिन इतनी स्मृति तो है कि एक लड़की थी, जो उसकी किताब अपने तकिए के नीचे दबाकर सोती थी. हमें प्रेम ही नहीं, प्रेम की स्मृति भी बचाती है. उस बूढ़े को प्रेम की स्मृति ने अब तक बचाए रखा है, उम्मीद से भरे रखा है कि मरने से पहले एक बार उस लड़की का चेहरा याद आ जाएगा. शायद प्रेम की यही स्मृति उसे भविष्य में भी बचाकर रखेगी. प्रेम जीवन से चला जाए, तो भी प्रेम की स्मृति हमें एक बेहतर मनुष्य बनाए रख सकती है.

इस तरह यह पूरी कविता छवियों में चलती है. असंबद्ध छवियों में. यह कहीं न कहीं मेरी भाषा में एक कवि के बर्बाद भविष्य की छवि है. यह उन ख़ास कविताओं में से है, जो मुझे बहुत प्रिय रही हैं.

‘दूध के दाँत’ की प्रेरणा उसी कविता के आरंभ में एपिग्राफ़ की तरह प्रयुक्त कृष्णनाथ की पंक्तियों में छिपी है. कृष्णनाथ हिंदी के सबसे सुंदर गद्यकारों में से थे. उनमें भाषा व दर्शन का एक दुर्लभ प्रांजल प्रवाह था. वह मृत्यु की पंक्ति है—‘देह का कपड़ा, देह की गरमी से, देह पर ही सूखता है.’ सूखने के लिए कहीं और नहीं जाना, कोई और धूप नहीं चाहिए. यही तो जीवन है. जो कुछ है, यहीं है, इसी क्षण में है.  हम ख़ुद-ब-ख़ुद ख़त्म होते रहते हैं, जैसे पानी, क्षण-क्षण भाप बनता रहता है, जैसे कपूर, अदृश्य में घुलता रहता है, जैसे हमारी उम्र का झरना, समय की नदी में अनवरत गिरता रहता है. हम दाँत बोते हैं और पेड़ उगता है. हम एक मासूम पेड़ को काटेंगे और वह हमारा कर्मा होगा, जो एक दिन लौटकर आएगा और हमसे प्रश्न पूछेगा. हमारे कर्म अनुत्तरित प्रश्नों की तरह हवा में भटकते हैं, वे आवारा कुत्तों की तरह आधी रात रोते हैं, बेवजह हिंसक होकर भौंकते हैं. हम कितना भी संयमित होना चाहें, हम अंदर से हिंसक और विश्वासघाती हैं. ये सारी बातें इस कविता के मूल में हैं. और यह कविता भी अंतत: छवियों से बनी है. हर अनुच्छेद एक छवि का चित्रण है. यह अपेक्षाकृत अमूर्त है, और अमूर्त पंक्तियाँ पाठक से एक विशिष्ट भागीदारी की माँग करती हैं कि आओ, और मुझे पूरा करो, कि मैं एक पत्थर हूँ और जब तुम मुझे पढ़ोगे, मैं एक मूर्ति में बदल जाऊँगा. वह तुम्हारी अपनी मूर्ति होगी. यह कविता समय के हाथ से छूटते चले जाने और मनुष्य की अप्रत्याशा पर विश्वास की कविता है.

आज के कवियों को सलाह

अगर आपको यह लेख जानकारीपूर्ण लगा, तो हम आपको गीत द्वारा दी गई कविता लिखने की सलाह को यहाँ पढ़ने का सुझाव देंगे।

2 Comments

  1. Yes I want to write poetry and prose but due to lack of guidance I repeat same words again and again how I can be write more better

Leave a Response